Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
सच्छिद्रैरदृढैः सूक्ष्मैर्गोपितैर्जाड्यसंयुतैः ।
अनल्पैरपि निःसारैः पद्मस्येव गुणैरलम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशमार्ग में पथिक के विश्राम के साधन न
तृण हैं और न जल है, गाँव तो है ही नहीं, कसबे और नगर की तो तनिक भी संभावना नहीं है,
पत्तों की राशियों से सूर्य आकाशमार्ग में प्रतिदिन यात्रा करते हैं | सच है, सात्विक पुरुष प्रारब्ध
किये हुए कामको छोड़ते नहीं हैं, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो