Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
प्रतीक्षमाणा दयितं रसपूरकरं धरम् ।
नारीव सरसी चारुहंसकाभ्यां विराजते ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वतराज के वनों के मध्य में स्थित ये गाँव जिन्होंने भाँति-भाँति के फूले हुए फूलों की राशियों से
शीतलता, सुगन्धि, पराग आदि सार को प्राप्त वायु के लतापत्रों के परिचालनों से पथिकों के अंगों
को शीतलता पहुँचाई है, जिनमें जल के गुण शीतलता से प्रख्यात वायुओं के प्रसार से जलाशयों
में लहरियां तैर रही हैं, सुगंध के गुण की अधिकता से चन्द्रमण्डल को जीत रहे हैं । चन्द्रमण्डलस्थ
देवताओं की अपेक्षा ग्रामवासियों को अधिक सुख है, यह भाव है