Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
आत्मनैवोह्यमानानां चक्रावर्तविधायिनाम् ।
जडाशयानां विषमा हा कल्लोलपरम्परा ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा भले ही मलिनता आदि भी दोष ठुममें लो फिर भी निर्विकारिता के बलपर भी वोक्युक्त
सक अनर्थो से विहीनतारूप छुख दुम्हें छुलभ है, इस अभिप्राय से कहते हैं /
यद्यपि आकाश जगत् के सम्पूर्ण दोषों से भरा है फिर भी सदा अविकारी आकाश को तत्त्वज्ञानी
के समान सर्व अनर्थ की शन्यतारूप सुख है, ऐसा मेरा विश्वास है