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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 6

पॉँचवाँ सर्ग समाप्त छठा सर्ग देह और आत्मा का विवेक, देह में आत्मदर्शन से दुःख तथा अंगनाओं के संग से मूढो के मोह की अभिवृद्धि इन विषयों का वर्णन |

56 verse-groups

  1. Verse 1उक्त रीति से यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी भली प्रकार प्रबुद्ध हो चुके थे, तथापि दूसरे श्रोताओं…
  2. Verse 2श्रोता, श्रवण करानेवाला, श्रोतव्य आदि भेद बाधित होने से मेरी श्रवण में प्रवृत्ति कैसे होग…
  3. Verse 3सबसे पहले इन्द्रियो पर विजय पाने की सामर्थ्य श्रोताओं मे न होने के कारण उन इन्द्र्यो द्वा…
  4. Verse 4जिस ज्ञानी पुरुष की ज्ञानवश त्रिकाल में अबाधित एकमात्र आत्मा में ही स्थिति रहती है, उस (४…
  5. Verse 5व्यवहार कर रहे जिस ज्ञानी पुरुष को दोषदर्शन के कारण भोग्य पदार्थो में सर्वदा कुत्सा के सि…
  6. Verse 6अव देह ओर आत्मा की एकता के भ्रम के निरास के लिए युक्तियाँ बतलाते है । श्रीरामजी, जैसे प्र…
  7. Verse 7इसी प्रकार निर्विकारिता और सविकारिता आदि से जनित विरोध के कारण भी सम्बन्ध की प्रसक्ति नही…
  8. Verse 8जड, अज्ञानी, तुच्छ, कृतघ्न (आत्मा से अपनी प्रसिद्धि पाकर उसी को दुःखभागी बनाने के कारण कृ…
  9. Verse 9तब देह में ही चैतन्यरूप धर्म मान लीजिए, उससे कोई विरोध तो होता है नहीं, इस प्रकार की आशंक…
  10. Verse 10यदि शकाहो कि आत्मा के मानस दुखों का उपभोग करने पर शरीर में क़ृशता उत्पन्न हुई देखी जाती ह…
  11. Verse 11किंच, असंग एवं परम सूक्ष्म आत्मा के साथ स्थूल शरीर का सम्बन्ध जव हो ही नहीं सकता, तब अभेद…
  12. Verse 12परस्पर उपघाती स्वभाव से युक्त होने से भी ऐक्य की प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं। एक दूसरे…
  13. Verse 13विचित्र (विभिन्न) दृष्टियों में सद्रूप ब्रह्म कभी असरूप (देहादिरूप) नहीं हो सकता ओर आत्मा…
  14. Verse 14दृष्टान्त बतलाने के लिए प्रतिपादित अर्थ का ही पुनः कथन करते है। जैसे जल में स्थित कमल का…
  15. Verses 15–17जैसे निर्लिप्तस्वभाव होने के कारण लेपक पदार्थ से विलक्षण स्वभाववाले वायु आदि लेपक पदार्थो…
  16. Verse 18श्रीरामजी, जिस प्रकार प्रतिविम्ब के आश्रय दर्पण आदि के हिलाने पर बिम्बभूत सूर्य आदि का तन…
  17. Verse 19आत्मा का भली प्रकार साक्षात्कार हो जाने पर परमार्थ सत्यरूप आत्मा में ही स्थिति हो जाती है…
  18. Verse 20अन्धकार और प्रदीप पदार्थ की नाई परस्पर उत्थान स्वभाववाले देह ओर देहाधिष्ठान आत्मा इन दो न…
  19. Verse 21अब अज्ञानी के जगत-दर्शन-पद्धति की निन्दा करने के लिए कहते है । जिस पुरुष को आत्मा का साक्…
  20. Verse 22आत्मा के अर्थ का (स्वरूप का) भली प्रकार पर्यालोचन जिन्होंने नहीं किया है, अतएव विज्ञानस्प…
  21. Verse 23यदि देह आदि अचेतन हैं, तो वे किस तरह संभाषण करते हैं और तृण, काष्ठ आदि के आहरण आदि से किस…
  22. Verse 24वे तृण, काष्ठ लाते हैं और उनका परित्याग भी करते हैं, वे तरगों के सदृश अतिचपल अवयवो से युक…
  23. Verse 25देह आदि स्वयं जड ही हैं, तथापि चेतन-से होकर भोगाभिनिवेश रूपी मदिरावत्‌ उन्मादक रस से घूर्…
  24. Verse 26तब क्या उनमें आत्म चैतन्य है ही नहीं ? नहीं, आत्मचैतन्य तो है, परन्तु अबोध के कारण व्यर्थ…
  25. Verse 27उन मूढ़ों से एकमात्र मूर्खतावश श्वाससन्तति ऐसे शीघ्र-शीघ्र निकलती रहती है,जैसे लोहार की ध…
  26. Verse 28उस प्रकार मूर्खतावश उत्पद्यमान परतर्जन या गर्जन चैतन्य का ज्ञापक है, किन्तु धनुष की डोरी…
  27. Verse 29मूढ से होनेवाला जो फल लाभ है, वह जंगल के तरु की तरह है और उसमें जो विश्रान्ति है, वह तप्त…
  28. Verse 30मूर्ख के साथ की जानेवाली संगति उस प्रकार की होगी, जिस प्रकार अरण्यभूमि में स्थाणु के (छिन…
  29. Verse 31श्रीरामजी, इस अधम मूर्ख को जो दिया गया है, वह क्या कीचड़ में फेंका गया नहीं समझना चाहिए ?…
  30. Verse 32अज्ञानी की निन्दा अज्ञान की हेयता प्रदर्शित हो जाय, इसलिए दयावश की गई है, न कि अज्ञानियों…
  31. Verse 33अज्ञानी को उग्र दुःख और सांसारिक क्षणिक सुख भी बार-बार आते और जाते रहते हैं, उनका उस प्रक…
  32. Verse 34देह, धन, रत्री आदि मे आसक्ति रखनेवाले अज्ञानी का यह दुष्ट दुःख कभी भी शान्त नहीं होता
  33. Verse 35इस अनात्मभूत, शठ देह में आत्मभाव प्राप्त करनेवाले पुरूष में असत्यबोधमयी माया क्या किसी प्…
  34. Verses 36–37दुष्ट भावों से भली प्रकार व्याप्त हुई बुद्धि से युक्त आत्मरूप वस्तु के विषय में अन्ध तथा…
  35. Verse 38मनरूपी हाथी की श्रुखलाभूत देहरूप सेमल के वृक्ष-कोटर में रहनेवाली सर्पिणीरूपी आशाएँ अज्ञान…
  36. Verse 39श्रीरामजी, पापरूपी सर्पो से वेष्टित अज्ञानी पुरुष की नरकरूपी लक्ष्मी उस प्रकार यहाँ प्रती…
  37. Verse 40चपल नेत्ररूपी भ्रमरियों से युक्त प्रस्फुरित अधररूपी पल्‍लवोंवाली अंगनारूपी विषलता केवल मू…
  38. Verse 41अज्ञानी पुरुष के मनरूपी उर्वराभूमि में ही विरल पल्लवो से युक्त अनर्थ हेतु पापादिरूप पक्षि…
  39. Verse 42अज्ञानी के मनरूपी जलशून्य अरण्य में कम्पित हो रहे ओष्ठरूपी तरुपल्लवों पर प्रकाशमान निःश्व…
  40. Verse 43अज्ञानी के मात्सर्यरूप जल से परिपूर्णं मन में दूसरे की निन्दारूपी पल्लवो से युक्त, चिन्ता…
  41. Verse 44मरणरूपी बडवाग्नि अज्ञपुरुष के प्रति ही, जिसने कि प्रतिजन्म में अनेक तरह के प्रतीकारोपायरू…
  42. Verse 45जन्म आदि भी उत्तरोत्तर अनर्थो की ही प्राप्ति कराते हैं, ऐसा कहते हैं। अज्ञ पुरुष का ही जन…
  43. Verse 46अज्ञानी पुरुष ही इस जगतरूपी जीर्णं घटीयन्त्र में (रहट में) संसाररूपी रज्जु से वेधा हुआ मज…
  44. Verse 47जो यह जगत ज्ञानी महात्मा की बुद्धि से तुच्छ और गाय के खुरमात्र यानी स्वल्प जलाशय रूप प्रत…
  45. Verse 48जिस प्रकार पक्षिणियाँ पिंजड़े से बाहर निकल नहीं पाती, वैसे ही उदर भरण में अति-आसक्तिरूपी…
  46. Verse 49क्यो उनकी बुद्धिर्यो संसारसागर का पार प्राप्त नहीं कर सकती, इस पर कहते हैँ । "परांचि खानि…
  47. Verse 50अज्ञानी व्याध ने इन्द्रियरूपी गीधों के लिए (यानी शिकार के योग्य श्येन आदि के लिए) रागवश (…
  48. Verse 51“आमिषपिण्डवत्‌” यहाँ पर वतिप्रयोग भ्रान्तिद्रष्टि से भेद का अभाव होने पर सादृश्य का अभाव…
  49. Verse 52असीम संकल्प-कल्पनारूपी कल्पवृक्ष सबसे बढ़कर है, क्योकि अत्यन्त असत्‌ भी पदार्थो से सम्पूर…
  50. Verse 53उस कल्पवृक्ष पर चित्र-विचित्र रचनाओं से युक्त भोगो मे अत्यन्त आसक्त पक्षी रहते, प्रकाशते,…
  51. Verse 54उस कल्पवृक्ष पर जन्म ही पल्लव हैं, कर्मो का समूह ही कलिका है, पुण्य-पाप ही फल हैं और विभव…
  52. Verse 55अज्ञानरूपी चन्द्रमा के उदय से ही इस संसारूपी अरण्य के भाग में स्त्रीरूपी लताएँ विस्पष्टरू…
  53. Verse 56अज्ञान में उक्त चन्द्रत्व का उपपादन करते हैँ । विवेकरूपी सूर्य के अस्त समय में उदित होनेव…
  54. Verses 57–58वासनारूपी अमृत से युक्त आशारूपी चकोर पक्षियों का पोषण करनेवाले चित्तरूपी आकाशमणि के (सूर्…
  55. Verse 59यानी मूर्खता ही रमणीशोभाकार से परिणत होती है, वास्तव में वहाँ कुछ भी शोभन पदार्थ नहीं है
  56. Verses 60–61अज्ञान ही समस्त अनर्थो का हेतु है, यों बतलाते हुए उपसंहार करते हैँ । हे श्रीरामचन्द्रजी,…