Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
न प्रयान्त्यपरं पारं विहङ्ग्यः पञ्जरादिव ।
भावमात्रपरावृत्तवासनाभारनाभयः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यो उनकी बुद्धिर्यो संसारसागर का पार प्राप्त नहीं कर सकती, इस पर कहते हैँ ।
"परांचि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्" । (स्वयंभू ने इन्द्रियाँ
बहिर्मुख बनाई हैं, अतः बाहर देखता है, भीतर अन्तरात्मा को नहीं देखता) इत्यादि श्रुतियों के
अनुसार एकमात्र बाह्य विषयों में लगी हुई वासनाओं के भार से आक्रान्त हुए हृदयरूपी नाभि
से युक्त हो रही विषयरूपी कीचड़ में फँसी हुई जन्मरूपी रथ के चक्र की इन्द्रियरूप नेमियों
(पिये की तीली) का अज्ञानी द्वारा पंक से निकालकर शोधन नहीं किया जा सकता