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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

तद्गतस्याप्यतद्वृत्तेरम्बरस्येव वायुतः । जरा मरणमापच्च सुखदुःखे भवाभवौ ॥ १५ ॥ मनागपि न सन्तीह तस्मात्त्वं निर्वृतो भव । स्थितो देहतयाप्युच्चैः पातोत्पातमयो भ्रमः ॥ १६ ॥ दृश्यते केवलं ब्रह्मण्यप्सु वीचिचयो यथा । आत्मसत्तोपजीवित्वादात्मानुभवतीह हि ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे निर्लिप्तस्वभाव होने के कारण लेपक पदार्थ से विलक्षण स्वभाववाले वायु आदि लेपक पदार्थो में प्रविष्ट हुए भी आकाश का वायु से शोष, कम्प, धूलिसम्बन्ध आदि दोषों का सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देह आदि से इस आत्मा मे जरा, मरण, आपत्तियाँ, सुख, दुःख, संसार, संसारविनाश आदि कुछ भी नहीं होता, अतः आप सुखी हो जाइए। यद्यपि देह में आत्मदृष्टि से जन्म, मरण आदि भ्रम उत्पन्न होते है, तथापि, जल में तरगों की नाई, वे केवल ब्रह्ममात्ररवरूप है, अतिरिक्त नहीं, आत्मा की सत्ता से उपजीवी होने के कारण, अपने में स्थित देहयन्त्रका स्वयं आत्मा ही, एकमात्र अपने में स्थित ऊर्मि का जल की नाई अनुभव करता है