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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

इयं संसारसरणिर्वहत्यज्ञप्रमादतः । अज्ञस्योग्राणि दुःखानि सुखान्यपि दृढानि च ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी को उग्र दुःख और सांसारिक क्षणिक सुख भी बार-बार आते और जाते रहते हैं, उनका उस प्रकार उल्लंघन नहीं कर सकते, जिस प्रकार हल या रथ पर्वत का उल्लंघन नहीं कर सकते