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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verses 57–58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 57,58

संस्कृत श्लोक

शून्योदितात्मा दोषेशो जयत्यज्ञानचन्द्रमाः । अज्ञानेन्दोः प्रसादेन वासनामृतशालिना ॥ ५७ ॥ तर्पिताशाचकोरेण चित्तरत्नरसैषिणा । राजहंसविलासिन्यः प्रालेयशिशिराङ्गिकाः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

वासनारूपी अमृत से युक्त आशारूपी चकोर पक्षियों का पोषण करनेवाले चित्तरूपी आकाशमणि के (सूर्य के) रस को (अमृत को) चाहनेवाले अज्ञानरूपी चन्द्रमा के प्रसाद से ही राजहंस की नाई विलासयुक्त, हिमालय की नाई शीतल अंगों से युक्त तथा चपलनेत्ररूपी भ्रमरो से समन्वित कान्तारूपी कुड्य प्रकाशित होती है