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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यस्य ज्ञानात्मनो ज्ञस्य सत्येवात्मनि संस्थितिः । संतुष्ट्यैवाक्षसुहृदो न घ्नन्ति तमनिन्दितम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस ज्ञानी पुरुष की ज्ञानवश त्रिकाल में अबाधित एकमात्र आत्मा में ही स्थिति रहती है, उस (४) "यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ यस्तु विज्ञानवान्‌ भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥* जो अज्ञानी पुरुष अवशीभूत मन से युक्त रहता है, उसकी इन्द्रिय उस प्रकार वश में नहीं रहती, जिस प्रकार दुष्ट घोड़े सारथि के वश में नहीं रहते । जो ज्ञानी पुरुष सदा वशीभूत मन से युक्त रहता है, उसकी इन्द्रियों उस प्रकार वश में रहती हैं, जिस प्रकार उत्तम घोडे सारथि के वश में रहते हैं। अनिन्दित पुरुष को आत्मदर्शनोपकार-जनित सन्तोष से इन्द्र्यो मित्र बनकर विनष्ट नहीं करतीं, किंतु ज्ञान की अभिवृद्धि के अनुकूल आचरण से उसकी रक्षा करती है