Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
तेन सार्धं कथा यत्तत्कौलेयाह्वानमम्बरे ।
अज्ञानमापदां निष्ठा का हि नापदजानतः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी की निन्दा अज्ञान की हेयता प्रदर्शित हो जाय, इसलिए दयावश की गई है, न कि अज्ञानियों
के प्रति द्रेषषश की गई है, इस आशय से कहते हैं।
अज्ञान ही आपत्तियों का आश्रय यानी स्थान है। भला बतलाइए तो सही कि कौन-सी आपत्तियाँ
अज्ञानी को प्राप्त नहीं होती ? इस संसाररूप सरिता का जो प्रवाह है, वह एकमात्र अज्ञानी के प्रमाद
से ही चल रहा है