Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
भेदमभ्युपगम्यापि श्रृणु बुद्धिविवृद्धये ।
भवेदल्पप्रबुद्धानामपि नो दुःखिता यथा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रोता, श्रवण करानेवाला, श्रोतव्य आदि भेद बाधित होने से मेरी श्रवण में प्रवृत्ति कैसे होगी या
उससे फल क्या होगा 2 इस पर कहते है ।
हे भद्र, बाधितानुवृत्तिन्याय से भेद का स्वीकार कर बोध की अभिवृद्धि के लिए आप श्रवण में
प्रवृत्ति कीजिए । अल्प ज्ञानवालों की भी इससे संसारिता नहीं होगी यानी आपके ज्ञान की वृद्धि ओर
अल्प प्रबुद्धो का उद्धार श्रवण का फल है