Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
असद्बोधमयी माया कथं नामापि नश्यति ।
दुर्भावस्वञ्चितधियो वस्तुन्यन्धस्य दुर्मतेः ॥ ३६ ॥
अवस्तुनि सनेत्रस्य लुठतश्च पदे पदे ।
विषमुत्पद्यते चन्द्रादामोदः कुसुमादिव ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
दुष्ट भावों से भली प्रकार व्याप्त हुई बुद्धि से युक्त आत्मरूप वस्तु के विषय में
अन्ध तथा अनात्मभूत असत् अर्थो में दृष्टियुक्त पद-पद पर गिर रहे दुर्मति पुरुष को चन्द्र से भी
विष उस प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार कुसुम से आमोद उत्पन्न होता है तथा क्षीर से कण्टक
ऐसे उत्पन्न होता है, जैसे स्थल से दूब का अंकुर उत्पन्न होता है