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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सविहारागमापाया महौघा इव दुर्धियः । सर्वेषामेव चैतेषां स्थितैवैषा चिदव्यया ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्या उनमें आत्म चैतन्य है ही नहीं ? नहीं, आत्मचैतन्य तो है, परन्तु अबोध के कारण व्यर्थ- साहो गया है, ऐसा कहते हैं। इन सभीमें अविनाशी यह चैतन्य रहता ही है, परन्तु इसका भली प्रकार परिचय न होने के कारण इसने कार्पण्य प्राप्त कर लिया है