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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

तयोः कीदृग्विधा भूता समानसुखदुःखता । यौ समौ समधर्माणौ न कदाचन तौ कथम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शकाहो कि आत्मा के मानस दुखों का उपभोग करने पर शरीर में क़ृशता उत्पन्न हुई देखी जाती है एवं देह में ताडन आदि करने पर आत्मा में दुःख का अनुभव होता है, ऐसी स्थिति मे शरीर ओर आत्मा दोनो में समान सुख-दु:खों के अनुभव से उनका तादात्म्य क्यो न माना जाय ? तो इस पर कहते हैँ । जो आत्मा ओर देह अग्नि ओर लोहपिण्ड की नाई अविविक्त अतएव एक दूसरे के धर्मों का एक दूसरे में संक्रमण होने के कारण समानधर्मवाले प्रतीत होते हँ तथा विविक्त होने पर तो उस प्रकार के नहीं प्रतीत होते, उनकी किस प्रकार समान सुखदुःखरूपता वास्तव में सत्य कही जा सकती हे ?