Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यावप्यसक्तावन्योन्यं मिथः संनमितौ कथम् ।
कथं स्थूलोऽणुरूपः स्यादणुः स्थूलः कथं भवेत् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
किंच, असंग एवं परम सूक्ष्म आत्मा के साथ स्थूल शरीर का सम्बन्ध जव हो ही नहीं सकता, तब
अभेद की तो बात ही क्या ? यों कहते हैं।
जो एक दूसरे से अत्यन्त विविक्त यानी सर्वथा विलक्षण पदार्थ हैं, वे एक दूसरे से तादात्म्यरूप से
या धर्मसंक्रमण द्वारा कैसे मिल सकते हैं, क्योंकि जो मेरु आदि स्थूल पदार्थ हैं, वे परमाणुस्वरूप कैसे
हो सकते हैं या परमाणु आदि अणुभूत पदार्थ मेरु आदि स्थूलपदार्थस्वरूप कैसे हो सकते हैं ?