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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

पदार्थे स्फुरतो यस्य न स्तुतिर्निन्दनादृते । स देहं देहदुःखार्थमादत्ते केन हेतुना ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

व्यवहार कर रहे जिस ज्ञानी पुरुष को दोषदर्शन के कारण भोग्य पदार्थो में सर्वदा कुत्सा के सिवा प्रशस्तपन की बुद्धि उत्पन्न होती ही नहीं, वह पुरुष देह-प्रयुक्त दुःख के लिए आत्मरूप से देह का किस हेतु से ग्रहण करेगा, ग्रहण करने में कोई हेतु नहीं हे, यह अभिप्राय है