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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

स्पन्दन्ते चेतितोन्मुक्तास्तृणवन्मूढबुद्धयः । अनास्थादितचित्तत्वाज्जडाः सर्वे खवायुभिः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि देह आदि अचेतन हैं, तो वे किस तरह संभाषण करते हैं और तृण, काष्ठ आदि के आहरण आदि से किस तरह व्यवहार करते हैं ? इस पर कहते हैं। वे देह आदि सब जड़ पदार्थ हैं, क्योकि उनमें चैतन्यरूपता का कुछ भी रस नहीं है, अतः वे सब जड़ होने पर भी मुख, नासिका आदि छिद्रों तथा उन छिद्रों में संचरणशील वायुओं के द्वारा जैसे घास के तिनके चेष्टा करते वायु के द्वारा चेष्टा करते हे वैसे ही स्फुरण ओर संचरण करते है । अथवा मूढबुद्धि लोग चेतनता से रहित तृण के समान चेष्टा करते हैं तथा चेतनता का आस्वादन लेने से सब जड़ नासिका, कंठ आदि छिद्रों से संचारी पवनों के द्वारा जिस स्थान में अभिघात से आक्रांत होते हैं वहाँ स्फुरित होते हैं । वे खोखले बाँस जैसे हैं जो वायु के संसर्ग से हिलते डुलते हैं ओर ध्वनि उत्पन्न करते हैं