Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
किंत्वबोधवशादस्याः परां कृपणतां गता ।
श्वाससंततयो ह्यज्ञाल्लोहकारदृतेर्यथा ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उन मूढ़ों से एकमात्र मूर्खतावश श्वाससन्तति ऐसे
शीघ्र-शीघ्र निकलती रहती है,जैसे लोहार की धौंकनी से वायुसन्तति निकलती रहती है, वह
श्वाससन्तति केवल जठराग्नि की क्रिया के लिए ही है और किसी अर्थ के लिए नहीं, क्योकि मूर्खता
अनर्थ करनेवाली हे