Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verses 60–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, verses 60–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
रामारजन्यो राजन्ते तन्मौर्ख्येण विजृम्भितम् ॥ ६० ॥
आपातमात्रमधुरत्वमनर्थसत्त्वमाद्यन्तवत्त्वमखिलस्थितिभङ्गुरत्वम् ।
अज्ञानशाखिन इति प्रसृतानि राम नानाकृतीनि विपुलानि फलानि तानि ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान ही समस्त अनर्थो का हेतु है, यों बतलाते हुए उपसंहार करते हैँ ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जो कि विषयों मेँ केवल ऊपर-ऊपर से दिखाई पडनेवाली मधुरता,
अनर्थपर्यवसायिता, आद्यन्तवत्ता, देशतः परिच्छिन्नता ओर समस्त अवस्थाओं मेँ नश्वरता प्रसिद्ध
है, वे सब अज्ञानरूपी वृक्ष के ही फल हैं, चूँकि उस प्रकार के नानाकृति अनेकविध फलबीजांकुर
परम्परा से अज्ञान-वृक्ष से जगदाकार रूपतः फैले हुए हैं, इसलिए उनके मूलभूत अज्ञान का ही
उच्छेद कर देना चाहिए