Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 41
चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसवाँ सर्ग शास्त्र एवं आचार्य आदि की सफलता, नामभेदों की कल्पना, अध्यारोप का क्रम और तदनन्तर अपवाद इन सबका वर्णन ।
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- Verse 1“नेश्वरस्या55कृतेब्रह्मन् व्यपदेशो हि युज्यते” (यो.नि.४०।११) इत्यादि से जव पूज्यतत््व नी…
- Verse 2हे तीनों लोकों के स्वामिन् भगवन्, “ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मण स्त्रिविध: स्मृतः ।* इत्…
- Verse 3प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है, इस आशय से समाधान करते हैँ । ईश्वर ने कहा : हे मुने, आदि और अ…
- Verse 4महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे ईशान, जो बुद्धि आदि से युक्त चक्षु, श्रोत्र आदि बाह्य इन्द्रि…
- Verses 5–6ईश्वर ने कहा : हे महर्षे, (प्रमाणजन्य शुद्ध सात्विकभाग की परिणामस्वरूप जो ब्रह्माकारवृत्त…
- Verse 7उससे प्रक्रत मे क्या आया ? इस पर कहते हैं। तदनन्तर चिरकाल तक अभ्यास करने के कारण, काकताली…
- Verses 8–9अविद्यांश से ही अविद्या के क्षय तथा आत्मा से ही आत्मा की निर्मलता सिद्धि में दृष्टान्त कह…
- Verse 10यदि कोई शंका करे कि जब बुद्धि से आत्मा का विचारकर निश्चय किया जाता है, यह आप स्वीकार करते…
- Verse 11अतएव गुरु, शास्त्र आदि नाना प्रकार के जो भेद दिखाई पडते हैं, वे न आत्मस्वरूप हैं और न आत्…
- Verse 12उसमें दूसरी युक्ति बतलाते हैं। क्योंकि इन्द्रियों से घटित (युक्त) जो पुर्यष्टक है, तत्स्व…
- Verse 13तब क्या गुरु आदि सव व्यर्थ हैं ? इस पर नहीं” ऐसा कहते हैं। हे विप्र, गले में पहने हुए विस…
- Verse 14शिष्य के बोध के लिए गुरुउपदेशों का क्रम प्रवृत्त हो जाने पर अनिर्देश्य और अदृश्य भी आत्मा…
- Verse 15इस तरह गुरु उपदेश आदि की आवश्यकता उपस्थित रहते उनमें अकारणता की उक्ति कैसे ? इस पर कहते ह…
- Verse 16और गुरु के उपदेशों और शास्त्रार्थों के बिना भी यह आत्मा अवबुद्ध नहीं होता, क्योकि इन सबके…
- Verse 17गुरु, शास्त्रार्थ और शिष्यों के चिर संयोग की सत्ता से, दिन में लोगों के आचार की नाई, आत्म…
- Verse 18यही कारण है कि परमानन्दस्वरूप यह आत्सदेव, जिसने अपने बोध से सम्पूर्ण अमंगलों का नाश कर दि…
- Verse 19जहाँ बाधकाल में यह सम्पूर्ण जगत् विद्यमान नहीं रहता ओर आरोप-काल मेँ तद्रूप से ही विद्यमा…
- Verses 20–23जीवन्मुक्तो की शिव", ब्रह्म ^ सत् इत्यादि नामो की कल्पना भी अधिकारियों के प्रबोधन के लिए…
- Verse 24हे वसिष्ठजी, इस तरह आकाश आदि जगत् के आरोप का अधिष्ठान होने से यह जगत्तत्त्व एवं तीनों अव…
- Verse 25प्राचीन लोगों ने शिव, आत्मा ओर परब्रह्म इत्यादि नामों से भिन्नता की रचना की है, वस्तुतः उ…
- Verse 26हे मुनिनायक, इस प्रकार देवार्चन कर रहा ज्ञानी पुरुष उस परमपद में पहुँच जाता है, जिस परम श…
- Verse 27अव शुद्ध विति मे जीवभाव ओर उसके संसरण आरोप क्रम की जिज्ञासा कर रहे महाराज वसिष्ठजी पृषतेह…
- Verse 28उत्तरोत्तर आरोप मे स्थूलता का आधिक्य (वुद्धि) कहने के लिए परम सूक्ष्मरूप मूल दिखलाते हैं…
- Verse 29वास्तव में अवेद्यवती निर्विकल्प समाधि में प्रसिद्ध चिदानन्देकरस-स्वभाव में स्थित होती हुई…
- Verse 30फिर तत्काल ही विषयों में तादात्म्यभावना से अहन्ता को (अहंकाररूप के) उस प्रकार प्राप्त कर…
- Verse 31अहंकाररूपता को प्राप्त हुई इस चिति की पहले इयत्ता और पौर्वापर्य का अवगाहन करने के कारण दे…
- Verses 32–34देश और काल की कल्पनाओं से संवलित वही चित्सत्ता “अहम्” इत्याकारक अभिमान में हेतुभूत संस्क…
- Verse 35इस तरह निश्चय के संस्कारो का उद्वोध होने पर बुद्धि आदि शब्दों की वाच्य भी वही शक्ति होती…
- Verse 36ज्ञानी लोग उसे ही (मन को ही) “आतिवाहिक देह है" इस उकिति का विषय बतलाते हैं। वही भीतर में…
- Verses 37–38इस प्रकार अन्दर की कल्पना बाह्य दृश्यसत्ता की कल्पना में कारण है, यह कहते हैं । ये पूर्वो…
- Verse 39तदनन्तर वायु की सत्ता तथा उसका प्रकाश करनेवाली स्पन्दसत्ता; स्पर्श की सत्ता और उसका प्रका…
- Verse 40एवं पृथ्वी की सत्ता, चाँदी और सुवर्णमय ब्रह्माण्डखप्परों की सत्ता एवं अत्यंत विपुल ब्रह्म…
- Verses 41–42इस उपर्युक्त इन सब सत्ताओं के समूह को अपने स्वरूप की नाई गोद में लेकर (>) शब्द व्यवहार मे…
- Verse 43इस रीति से आरोप के क्रम का विस्तार कर अब उसका अपवाद-क्रम दिखलाते है । हे महर्षे, अज्ञानिय…
- Verse 44जैसे जल के आधारभूत समुद्र के उदर में जल ही जलतरंग के विलास में परिस्फुरित होता रहता है, व…
- Verse 45यह कैसे समझ मे आया ? इस पर कहते हैं। क्योकि सब दृश्यसमूह संवित्रूप ही है, इस प्रकार का सं…
- Verse 46इसका ज्ञान होने पर इसमें वस्तुरूपता होगी या इसका ज्ञान न रहने पर वस्तुरूपता होगी ? दोनों…
- Verse 47इस पर यदि कोई कहे कि स्वतः चिन्मात्रस्वभाव होती हुई भी यह वस्तु “बहु स्यां प्रजायेय" इस स…
- Verse 48ओर स्थूलदेह के सम्बन्ध से सब आन्तरिक कोशचतुष्टय तथा बाह्य विषय समूहों का, जो स्थूलता को प…
- Verse 49तदनन्तर हाथ, पैर आदि अवयव समूहों तथा आन्तर कोशो में पुरुष के आकार के साथ तादात्म्य की भाव…
- Verse 50इस अवस्था मेँ स्थित हुए जीवन धारण कर रहे इस असत् तुच्छ शरीर को, असत् ही स्वप्नावस्था के…
- Verse 51“यह सारा संसार मिथ्या है" ऐसा ज्ञान होने पर भी यह जगत् दुःख पैदा करता रहता ही है, इसलिए…
- Verse 52जब तक वासना का क्षय नहीं हो जाता, तब तक मिथ्यात्व का दृढ़तर निश्चय ही दुःख की निवृत्ति मे…
- Verse 53जगत् में अत्यंत अस्व का दृढ़ निश्चय हो जाने पर आश्रय और उसके विषय आदि का बिलकुल अभाव हो…
- Verse 54द्रष्टा के सहित, अहन्ता से युक्त और मन तथा मनन आदि के साथ इस जगत् का परिशेष में जब अस्ति…
- Verse 55वहाँ पर न तो कोई वासना रहती है, न कोई वासक रहता है और न कोई वासना का विषय (वास्य) ही रहता…
- Verse 56जिस प्रौढ़ की दृष्टि में व्यावहरिक या प्रातिभासिक दुष्ट संसारूप यक्ष शून्यस्वरूप होने के…
- Verse 57इस प्रकार शून्य में ही वेताल की नाई यह चित्तवासना उत्पन्न हुई है, जिसका नाम जगत् है। उसक…
- Verse 58अहन्ता में, जगत् में तथा मृगतृष्णा के जल में जिस मनुष्य की आस्था वधी हुई है, उस कलमुँहें…
- Verse 59वह क्यों उपदेश के योग्य नहीं है ? इस पर कहते हैं। इस जगत् में आत्मज्ञानी लोग विशिष्ट अधि…