Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
सर्वसत्तागणं चैतत्क्रोडीकृत्य स्वरूपवत् ।
स्फुरत्याश्रित्य पत्रादि बीजं बीजादितां गतम् ॥ ४१ ॥
एतत्पुर्यष्टकं विद्धि देहोऽयं चातिवाहिकः ।
अपारबोधमेतत्तु स्फुरत्यङ्ग विभागवत् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस उपर्युक्त इन सब सत्ताओं के समूह को अपने स्वरूप की नाई गोद में लेकर
(>) शब्द व्यवहार में हेतु है। शब्द शक्ति, ज्ञान व्यवहार में हेतु है - ज्ञानशक्ति और क्रियाव्यवहार
में हेतु है क्रियाशक्ति |
यानी तादात्म्यभाव से इन सबका संग्रह कर जैसे बीज अपने उत्तरोत्तर परिणाम से अंकुर, काण्ड,
शाखा ओर प्रशाखाओं में पहुँचकर (फैलकर) पत्ते आदि का आश्रय करता हुआ अर्थात् पत्ते आदि
को अपने से पृथक् न समझता हुआ स्फुरित होता है; वैसे ही जो यह स्फुरित हो रहा है, इसे यानी
उपर्युक्त सब सत्ताओं को अपने से अभिन्न समझकर बैठे रहनेवाले को हे मुने, आप स्थूलादि तीन
देहवाला पुर्यष्टक जानिए । यही वासनात्मक होने से आतिवाहिक देह भी कहलाता है । अपरिच्छिन्न
चित्स्वरूप ब्रह्म ही उक्त प्रकार के विभागवाला होकर स्फुरित हो रहा है, न कि ओर कोई
दूसरा