Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verses 8–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 8 ,9
संस्कृत श्लोक
यथाकथंचिदङ्गारे निघृष्य क्षालयञ्छिशुः ।
करनैर्मल्यमाप्नोति कार्ष्ण्याङ्गारक्षये यथा ॥ ८ ॥
यथाकथंचिच्छास्त्राद्यैर्भागैर्भागं विचारयेत् ।
सात्त्विकस्तामसो भागो द्वयोरात्मोदयस्तथा ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्यांश से ही अविद्या के क्षय तथा आत्मा से ही आत्मा की निर्मलता सिद्धि में दृष्टान्त कहते हैं ।
कोयले के दो टुकड़ों को लेकर बालक, जो एक दूसरे को परस्पर घिसकर खेल खेलने का आदी है,
खिलवाड़ करता हुआ उन दोनों कोयलों के नष्ट न होने तक हाथ साफ कर दिये जाने पर भी बार-बार
उसे घिसते ही रहने के कारण हाथ की निर्मलता प्राप्त नहीं करता, परंतु यथाकथंचित् घिसने से
उत्पन्न हुई धूलिपरम्परारूप कालिमा के साथ-साथ उन कोयलों के नष्ट हो जाने पर तो हाथ साफ
करता हुआ वही (लड़का) फिर दूसरे कोयलों के न मिलने से अपने आप हुई हाथ की निर्मलता (सुन्दरता)
जैसे स्वतः ही प्राप्त कर लेता है; वैसे ही सात्विक ओर तामस अविद्याभाग अपने सहायक स्वरूप दूसरे
शास्त्र आदि भागों से यथाकथंचित् यदि आत्मस्वरूप का विचार करें, तो दोनों भागों का नाश और
निर्मल आत्मस्वरूप की प्राप्ति सिद्ध हो सकती है