Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
संवित्संवेदनैकात्म पृथगेतदचेतनम् ।
संपद्यते परिज्ञातं संकल्पनगरोपमम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह कैसे समझ मे आया ? इस पर कहते हैं।
क्योकि सब दृश्यसमूह संवित्रूप ही है, इस प्रकार का संवेदन (ज्ञान) होने पर सब एकात्मक है ।
संविद् से पृथक् कर दिये जाने पर तो यह दुश्यसमूह, संकल्पनगर की नाई, अचेतन यानी भासकशून्य
परिज्ञात होता हे । तात्पर्य यह है कि दोनों प्रकार से इसमें जीवन नहीं हे