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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

अथैतद्विन्दते स्वान्तःसंकल्पादंशता स्वतः । तन्मात्रसत्ता तस्याणोरेतां पश्यति देहके ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस पर यदि कोई कहे कि स्वतः चिन्मात्रस्वभाव होती हुई भी यह वस्तु “बहु स्यां प्रजायेय" इस संकल्प के कारण अपने अन्दर ही दृश्यांशता को प्राप्त कर लेती है तो वह ठीक नहीं, क्योकि संकल्पद्रारा कल्पित वस्तुएँ मिथ्या ही हुआ करती हैं, इसलिए परमसूक्ष्म उस आत्मा की सूक्ष्ममात्र स्वभाव से जो सत्ता है, वह प्रथमकल्पित सृक्ष्मदेह में ही चिरकाल के अभ्यास के कारण स्थूलता का अवलोकन करती है यह अर्थतः सिद्ध हो जाता है