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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । वासनावशतो दुःखं विद्यमाने च सा भवेत् । अविद्यमानं च जगन्मृगतृष्णाम्बुभङ्गवत् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक वासना का क्षय नहीं हो जाता, तब तक मिथ्यात्व का दृढ़तर निश्चय ही दुःख की निवृत्ति में एकमात्र उपाय है, आपाततः मिथ्यात्वज्ञान से कुछ नहीं हो जाता, इस आशय से उत्तर देते हैं। ईश्वर ने कहा : महर्ष, वासना के कारण दुःख उत्पन्न होता है और वह वासना विद्यमान वस्तु में हुआ करती है। यह जगत्‌ तो मृगतृष्णा के जल के तरंग समान अविद्यमान (मिथ्या) ही है