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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verses 20–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verses 20–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 20-23

संस्कृत श्लोक

अविश्रान्ततया यत्र तनुविद्यैर्मुमुक्षुभिः । विचित्रशुद्धमननकलङ्ककलितात्मभिः ॥ २० ॥ अदूर एव तिष्ठद्भिर्जीवन्मुक्तस्य दृक्पथे । मोक्षोपासकबोधाय शास्त्रार्थरचनाय च ॥ २१ ॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रप्रमुखैर्लोकपालैः सुपण्डितैः । पुराणवेदसिद्धान्तसिद्धये भावितात्मभिः ॥ २२ ॥ चिद्ब्रह्म शिव आत्मेशपरमात्मेश्वरादिका । एतस्मिन्कल्पिता संज्ञा निःसंज्ञे पृथगीश्वरे ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवन्मुक्तो की शिव", ब्रह्म ^ सत्‌ इत्यादि नामो की कल्पना भी अधिकारियों के प्रबोधन के लिए ही है, यह कहते है । परमार्थस्वरूप में विश्रान्त न होने के कारण अल्पज्ञानी, अधिकारी जीवों को सांसारिक बन्धनो से छुड़ाने की चाह रखनेवाले, विचित्र जगत्‌ और शुद्धतत्त्व के मनन कलंक से युक्त मनवाले ओर परमार्थ के समीपवर्ती जीवन्मुक्त के दुष्टिपथ में स्थित हो रहे विशुद्ध अन्तःकरणवाले महापण्डित मुमुक्षु लोकपालों ने जिनमें ब्रह्मा, इन्द्र ओर सुद्र प्रमुख हैं - मोक्ष के लिए उपासना करनेवाले अपने भक्तों के बोध के लिए, शास्त्रार्थ की रचना के लिए (तत्त्व ओर तत्त्वज्ञान के उपायों के भलीर्भोति उपपादन करने के लिए) एवं पुराण, वेद और भगवान वेदव्यास के सूत्र की सार्थकता के लिए विना संज्ञावाले इस ईश्वर में चिद्‌, ब्रह्म, शिव, आत्मा, ईश, परमात्मा ओर ईश्वर आदि पृथक्‌-पृथक्‌ संज्ञाओं की कल्पना कर रक्खी हे