Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
अहन्तायां जगति च मृगतृष्णाजले च यः ।
सास्थस्तं थिग्घतनरं नोपदेश्यस्त्वसाविति ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता में, जगत् में तथा
मृगतृष्णा के जल में जिस मनुष्य की आस्था वधी हुई है, उस कलमुँहें को बार-बार धिक्कार हे !
वह नालायक इस उपदेश के लायक नहीं है