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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । योऽसौ ब्रह्मादिशब्दार्थः संविदं विद्धि केवलम् । स्वच्छमाकाशमप्यस्य स्थूलं मेरुरणोरिव ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

उत्तरोत्तर आरोप मे स्थूलता का आधिक्य (वुद्धि) कहने के लिए परम सूक्ष्मरूप मूल दिखलाते हैं । ईश्वर ने कहा : हे मुने, जो यह अपरोक्षरूप से प्रतीयमान ब्रह्म, परमात्मा पर ज्योति इत्यादि शब्दों का अर्थ यानी प्रतिपाद्यवस्तु है, उसे विशुद्ध संवित्‌ (चिति) ही समझिए । इसका प्रथम आरोपरूप आकाश इस प्रकार महान्‌ है, जिस प्रकार अणु से मेरु (भाव यह है कि चिति की सूक्ष्मता ओर जड की सूक्ष्मता में मेरु ओर अणु के समान विस्पष्ट ही अन्तर है ।)