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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

अतः किं वास्यते केन कस्य वा वासना कुतः । कथं स्वप्ननरेणाङ्ग मृगतृष्णाम्बु पीयते ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ में अत्यंत अस्व का दृढ़ निश्चय हो जाने पर आश्रय और उसके विषय आदि का बिलकुल अभाव हो जाने से ही वासना की पुनः उत्पत्ति नहीं होती, यह कहते हैं। इसलिए किससे कौन वासित होगा और किसको कहाँ से वासना होगी ? हे महर्षे, स्वप्नावस्था का पुरुष भला कैसे मृगतृष्णा के जल का पान कर सकता है ?