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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । अनाद्यन्तमनाभासं सत्किंचिदिह विद्यते । इन्द्रियाणामगम्यत्वाद्यन्न किंचिदिव स्थितम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है, इस आशय से समाधान करते हैँ । ईश्वर ने कहा : हे मुने, आदि और अन्त के परिच्छेदो से (अवधि से) स्वतः पृथकृभूत प्रकाशान्तर की अपेक्षा न रखनेवाली, स्वयंज्योतिःस्वरूप जो सद्भस्तु अपनी महिमा में अपने आप विद्यमान है, वही किंचित्‌ शब्दाभिधेय है यानी देश, काल, धर्म, जाति आदि दूसरों की अपेक्षा रखनेवाली सत्ता ओर पराधीन व्यावृत्ति से स्थित नहीं हे । और चूँकि वह इन्द्रियो की गम्य नहीं है, इसलिए “न किंचित्‌" शब्दाभिधेयरूप से भी स्थित हे । यहाँ “इव शब्द मिथ्यात्व-प्रदर्शनार्थ है