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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

यत्रेदमखिलं नास्ति तद्रूपेणैव चास्ति वा । तदाकाशादच्छतरमनन्तं सदिवास्ति हि ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ बाधकाल में यह सम्पूर्ण जगत्‌ विद्यमान नहीं रहता ओर आरोप-काल मेँ तद्रूप से ही विद्यमान रहता है, वह अधिष्ठान तत्त्व - जो व्यावहारिक सत्‌ से विलक्षण होने के कारण सत्‌ की नाई त्रिकाल में भी विद्यमान है आकाश से भी अत्यन्त स्वच्छ ओर अनन्त हे