Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अविद्यमानमेवेदं विद्यमानमिव स्थितम् ।
यथा तन्मे समासेन भगवन्वक्तुमर्हसि ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अव शुद्ध विति मे जीवभाव ओर उसके संसरण आरोप क्रम की जिज्ञासा कर रहे महाराज वसिष्ठजी
पृषतेहै।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे भगवन्, अविद्यमान ही यह जगत् विद्यमान की नाई जिस प्रकार से
स्थित हे, वह सब कुछ संक्षेपरूप से मुझसे कहने की कृपा कीजिए