Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अस्याहन्तादिरूपाया देशतां कालतां गताः ।
संपद्यन्ते ततः शून्यरूपिण्यः सख्य एव ताः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकाररूपता को प्राप्त हुई इस चिति की पहले इयत्ता और
पौर्वापर्य का अवगाहन करने के कारण देश-कालरूपता में प्राप्त हुई कल्पनाएँ उत्पन्न होती हैँ ।
तदनन्तर वे शून्यरूप कल्पनाएँ स्वयं ही उसकी सखी के रूप में अवस्थित हो जाती हैं