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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

काकतालीयवत्पश्चादविद्याक्षय आगते । प्रपश्यत्यात्मनैवात्मा स्वभावस्यैव निश्चयः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

उससे प्रक्रत मे क्या आया ? इस पर कहते हैं। तदनन्तर चिरकाल तक अभ्यास करने के कारण, काकतालीय-न्याय की तरह भाग्य के परिपाक से उत्पन्न हुई पूर्णब्रह्माकारवृत्ति से अविद्या का निःशेष उच्छेद हो जाने पर आवरणशून्य आत्मा स्वयं ही अपना स्वरूप देखने लगता है यानी वास्तविक अपने प्रकाशस्वरूप में अवस्थित हो जाता है । आत्मा के स्वभाव का यही, उक्त स्वप्रकाशस्वरूप से परिशेष रहना ही, निश्चय यानी असंदिग्ध ओर अविपर्यस्त साक्षात्कार है, किसी दूसरे प्रकार का नहीं, यह अर्थ हे । अथवा अविद्यास्वभाव का उक्त प्रकारवाला ही क्षय निश्चय है, किसी दूसरे प्रकार का नहीं, यह अर्थ है