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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

संपद्यमाना एवास्मिंश्चेतसीमा हि शक्तयः । पश्चादिह बहिष्ठास्ता उद्यन्त्यनुदिता अपि ॥ ३७ ॥ वातसत्ता स्पन्दसत्ता स्पर्शसत्ता तथैव च । त्वक्सत्ता तेजसां सत्ता तथा सत्ताप्रकाशिनी ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अन्दर की कल्पना बाह्य दृश्यसत्ता की कल्पना में कारण है, यह कहते हैं । ये पूर्वोक्त कल्पनाएँ पहले इस चित्त में उत्पन्न होती हुई ही पीछे फिर इसमें, कहे जानेवाले बाह्य दृश्याकार में परिणत होकर, उदित न हुई भी उदित होती हैं