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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

परं परे प्रस्फुरितं केवलं केवलात्म सत् । जलपीठस्य जठरे जलद्रवविलासवत् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जल के आधारभूत समुद्र के उदर में जल ही जलतरंग के विलास में परिस्फुरित होता रहता है, वैसे ही परब्रह्म में अद्वितीय सद्रूप ब्रह्म ही केवल परिस्फुरित हो रहा हे