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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 44

36 verse-groups

  1. Verse 1तैंतालीसवाँ सर्ग चौवालीसवाँ सर्ग मुक्ति और प्रलय में समानता होने पर भी इन दोनों में विलक्…
  2. Verse 2यह यद्यपि विशेषरूप से मैंने नहीं कहा, तथापि आपको अपनी बुद्धि से ही तर्क द्वारा समझ लेना च…
  3. Verse 3जो यह शरीर आदि रूप स्थावर-जंगम जगत है, यह आभासमात्र ही (विवर्तमात्र ही) है, अतएव असत्‌ स्…
  4. Verse 4यदि कोई कहे कि चिरकाल तक स्थिर रहनेवाले ब्रह्माण्ड. भुवन आदि आभासमात्र कैसे हो सकते है ?…
  5. Verse 5अज्ञानी के बीज रहनेके कारण पुनः संसारदर्शन होने पर भी ज्ञानी को पुनः संसारदर्शन की प्राप्…
  6. Verse 6बीजभूत अज्ञान में भावी संसार मोक्ष होने तक सूक्ष्मरूप से रहता है, इस कारण भी बारबार जन्म…
  7. Verses 7–8जैसे जल के भीतर आवर्त (भौरी) रहता है, बीज के अन्दर अंकुर रहता है, अंकुर के अन्दर विशाल वृ…
  8. Verse 9मन के अन्दर देह की सम्भावना कैसे है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं । मन की विविध रूप…
  9. Verses 10–11यह मन ही देह होता है। उत्तम कर्मो का परिपाक होने पर उत्तम देह होती है, यह बात आदि सर्ग से…
  10. Verse 12श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, जीव मन पद को प्राप्त करके जिस प्रकार विरंचिपद को प…
  11. Verse 13श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महाबाहो, ब्रह्मा के शरीर ग्रहण में जो क्रम है उसे आप मुझसे सुनिय…
  12. Verses 14–15देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न आत्मतत्व जब भी अपनी शक्ति से देश, काल से परिच्छिन्न शरीर को ध…
  13. Verses 16–17विविध कल्पना करने में संलग्न, ऐसा जो ऊपर कहा है, उसी को स्पष्ट करते हैं। कल्पना कर रही मन…
  14. Verse 18अपंचीकृत होने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म होने से मनोवच्छिन्न चैतन्यरूप जीव से न देखे गये शब्…
  15. Verse 19तदनन्तर उनसे घनता को प्राप्त हुआ मन निर्मल आलोकवाली प्रकाशता की क्षण भर मेँ भावना करता है…
  16. Verse 20आकाश, वायु ओर तेज से वृद्धि को प्राप्त हुआ मन रसतन्मात्ररूप जल की शीतता को क्षणमात्र में…
  17. Verse 21तदनन्तर पूर्वोक्त चारों के संघात को प्राप्त हुआ मन क्षणभर में गन्धयुक्त स्थूल स्वरूप की भ…
  18. Verse 22तदनन्तर इस प्रकार भूततन्मात्राओं से वेष्टित अपने सूक्ष्म शरीर का त्याग कर रहा मन आकाश में…
  19. Verse 23जिस शरीर को देखता है, अहंकारकला से युक्त, बुद्धिरूप बीज से सम्पन्न, पंचभूतों के हृदयकमल क…
  20. Verse 24आगे कही जानेवाली देह की भावना से लिंग शरीर के ही पचीकरण द्वारा घन होने पर स्थूल देह की उत…
  21. Verse 25संवि के अन्दर रखे हुए पिघले सोने के समान बाहर स्थूल भास्वर ओर अन्दर सूक्ष्म भास्वर वह तेज…
  22. Verses 26–27उसमें मन की विशेष कल्पनाभिनिवेशरूप शाखा-प्रशाखाओं की वृद्धि होती है, ऐसा कहते है। तेजपुंज…
  23. Verses 28–29तदनन्तर ज्वालाओं की पंक्ति के समान निर्मल आकारवाला, प्रकट अवयववाला बालक यह (ब्रह्मा) मनोर…
  24. Verses 30–31समय पाकर वह प्रकट होता है। निर्मल शरीरवाला पिघले हुए सुवर्ण के तुल्य तथा परम ब्रह्मा से उ…
  25. Verse 32परमाकाशरूप ब्रह्म में अन्य रूपवाला यह जिस प्रकार की अपनी सत्ता से रहता है, उसी प्रकार की…
  26. Verse 33समयभेद से उसकी नाना प्रकार की कल्पनाओं को दिखलाते हैं। कभी वह आर-पार-शून्य, आदि, मध्य और…
  27. Verse 34कभी (पृथिवी की सृष्टि के बाद और प्राणियों की सृष्टि के पूर्व) हरे रंग के वन की यानी वृक्ष…
  28. Verses 35–36यह प्रभु ब्रह्मा अपने हरेक जन्म में और-और भुवन, समुद्र, जीव-जन्तु आदिरूप अनेक आकारो की क्…
  29. Verse 37प्रथम कल्प से लेकर प्रतिदिन सोकर उठे हुए उसके स्वदेह कल्पनाक्रम को दिखलाते है । जब यह ब्र…
  30. Verses 38–41उसका उक्तस्वरूप करोड़ों रोमों से व्याप्त, बत्तीस दाँतों से युक्त, जंघाओं ओर रीढ़ की हड्डि…
  31. Verse 42तदनन्तर त्रिकालदर्शी भगवान ब्रह्मा ने अपने उत्तम ओर मनोहर रूप को देखकर विचार किया
  32. Verses 43–44जिसका [= सब ब्रह्माण्डों का ओर उनके अभिमानी हिरण्यगर्भो का काल से अपरिच्छिन्न पब्रह्मपद स…
  33. Verses 45–46तदनन्तर क्रमशः सांगोपांग सब धर्मो का उन्हे स्मरण हुआ । जैसे वसन्त अपने पूर्वपरिचित फूलों…
  34. Verse 47उनके स्वर्ग और मोक्ष के लिए धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिए अनेक प्रकार के अनन्त शास्त…
  35. Verse 48हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे वसन्त से पुष्पशोभा का आविर्भाव होता है, वैसे ही ब्रह्मारूपधारी म…
  36. Verse 49हे रघुकुलदीपक, विविध प्रकार की रचनाओं से पूर्ण क्रियाविलासों से ब्रह्मा का रूप धारण करनेव…