Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
निदर्शनेन तेनैव जागतीं ज्ञास्यसि स्थितिम् ।
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नमात्मतत्त्वं स्वशक्तितः ॥ १४ ॥
लीलयैव यदादत्ते दिक्कालकलितं वपुः ।
तदैव जीवपर्यायं वासनावेशतत्परम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न आत्मतत्व
जब भी अपनी शक्ति से देश, काल से परिच्छिन्न शरीर को धारण करता है, तभी वह जीवनामक,
वासनाओं के आवेश में तत्पर, विविध कल्पनाएँ करने में संलग्न, चंचल मन बन जाता है