Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
बहुरूपतया राम यतोऽस्त्येकतमः स्फुटः ।
स एव प्रतिभासोऽस्य मनसः किल जायते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के अन्दर देह की सम्भावना कैसे है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं ।
मन की विविध रूपों से प्रसिद्ध, देहरूप की भी वासनारूप से उसमें सम्भावना हो सकती है।
शंका : यदि ऐसा है, तो बहुत से शरीर एक साथ क्यो नहीं उत्पन्न होते ?
समाधान : वासनारूप से बहुत से शरीरों के मन में स्थित होने पर भी जो एक ही शरीर परिपक्व हुए
कर्मो से अभिव्यक्त होता है, वही विर्वतरूप शरीर इस जीव को प्राय: एक समय में प्राप्त होता है, सभी
शरीर प्राप्त नहीं होते