Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
द्रवत्कनकसंकाशः परमाकाशसंभवः ।
यथासौ परमाकाशे तिष्ठत्यपररूपवान् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
परमाकाशरूप ब्रह्म में अन्य रूपवाला यह जिस प्रकार की अपनी सत्ता से रहता है, उसी
प्रकार की व्यवहार के योग्य सत्ता से अपने अज्ञान को ही, जो कि आत्मा में स्थित है, पंचीकृत स्थूल
आकाश आदि के आगे कहे जानेवाले रूप से उत्पन्न करता हे