Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
कदाचित्काननं कार्ष्ण्यं कालं कमलकुड्मलम् ।
अन्यान्यन्यान्यनेकानि प्रतिजन्मावधिः प्रभुः ॥ ३५ ॥
कल्पयन्पालयत्येष नानारूपाणि हेलया ।
तत्रेदंप्रथमत्वेन यदैष ब्रह्मणः पदात् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह प्रभु ब्रह्मा अपने हरेक जन्म
में और-और भुवन, समुद्र, जीव-जन्तु आदिरूप अनेक आकारो की क्रीडा से रचना करता हुआ
विष्णु आदि के रूप से स्वयं ही उनका पालन करता हे