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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

दीर्घस्वप्नो ह्ययं राम मिथ्यैवानघ दृश्यते । द्विचन्द्रविभ्रमाकारं भ्रमान्तर्भ्रान्तशैलवत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि चिरकाल तक स्थिर रहनेवाले ब्रह्माण्ड. भुवन आदि आभासमात्र कैसे हो सकते है ? तो इस पर कहते हैं। हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, यह प्रपंच दीर्घकालीन स्वप्न के समान, दो चन्द्रमाओं की भ्रान्ति के समान एवं घूमने के समय घूमते हुए पहाड़ के समान मिथ्या ही दिखाई देता है