Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
भावयत्यनिलस्पन्दं स्पर्शबीजरसोन्मुखम् ।
ताभ्यामाकाशवाताभ्यामदृष्टाभ्यां मनोदृशा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अपंचीकृत होने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म होने से मनोवच्छिन्न चैतन्यरूप
जीव से न देखे गये शब्द-स्पर्शरूप उन आकाश ओर वायु से बढ़ने और आघात होने के कारण
रूपतन्मात्ररूप अग्नि उत्पन्न होती है