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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 28–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

पार्श्वयोर्हस्तसंस्थानां मध्ये चोदरधर्मिणीम् । प्रकटावयवो बालो ज्वालामालामलाकृतिः ॥ २८ ॥ मनोरथवशोपात्तवपुस्तिष्ठत्यसावथ । एवं स्ववासनावेशात्कलिताङ्गो मनोमुनिः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर ज्वालाओं की पंक्ति के समान निर्मल आकारवाला, प्रकट अवयववाला बालक यह (ब्रह्मा) मनोरथवश शरीर प्राप्त कर स्थित होता है। इस प्रकार अपना वासनाओं के आवेश से शरीर धारण किया हुआ मनरूपी मुनि (पूर्वोपासना के प्रकार का मनन करनेवाला) जैसे ऋतु अपने स्वभाव को बढ़ाती है, वैसे ही अपने शरीर को बढ़ाता है