Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
जनयत्यात्मनो मोहमात्मस्थं चित्तलीलया ।
कदाचित्केवलं व्योम परमं पारवर्जितम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
समयभेद से उसकी नाना प्रकार की कल्पनाओं को दिखलाते हैं।
कभी वह आर-पार-शून्य, आदि, मध्य और अन्तरहित केवल विशाल आकाश की कल्पना
करता है कभी (प्रतिदिन के प्रलय के समय) केवल निर्मल जल की ही कल्पना करता हे । कभी
(कल्प के अन्त में दाह के समय) ब्रह्माण्ड को प्रलयकाल की अग्निज्वालाओं से प्रदीप्त करता
है