Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 45–46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 45,46
संस्कृत श्लोक
अपश्यत्सर्गवृन्दानि समतीतान्यनेकशः ।
अथ सस्मार सकलान्सर्वान्धर्मगणान्क्रमात् ॥ ४५ ॥
वसन्तः कुसुमानीव वेदानादाय संस्तुतान् ।
लीलया कल्पयामास चित्रसंकल्पजाः प्रजाः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर क्रमशः सांगोपांग सब धर्मो का उन्हे स्मरण
हुआ । जैसे वसन्त अपने पूर्वपरिचित फूलों को ग्रहण करता है वैसे ही पूर्वपरिचित वेदों को ग्रहण कर
उन्होंने विचित्र संकल्पं से उत्पन्न हुई विविध प्रजाओं की गन्धर्वनगर में विविध आचार-विचारों के
तुल्य लीला से कल्पना की