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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । क्रमेणानेन येनाप्ता जीवेन स्थितिरात्मनः । स कथं भगवन्देहं समाधत्तेऽस्थिपञ्जरम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

तैंतालीसवाँ सर्ग चौवालीसवाँ सर्ग मुक्ति और प्रलय में समानता होने पर भी इन दोनों में विलक्षणता का कथन एवं विरंचिरूप जीव के शरीर-ग्रहण क्रम का कथन | प्रलय में अपने-आप शान्त पद में जीवराशियाँ विलीन होती है, ऐसा जो कहा है, उसमें श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, "उत्पत्योत्पत्य कालेन भुक्त्वा देहपरम्पराम्‌' इत्यादि आपके द्वारा उक्त क्रम से जिस जीव ने प्रलय में परम पद में अपनी स्थिति प्राप्त कर ली, वह मुक्त ही है, वह फिर अस्थिपिंजररूप देह को कैसे ग्रहण करता है ? भाव यह है कि परम पद को प्राप्त पुरुष को यदि पुनः संसारप्राप्ति हो, तो मुक्ति में भी लोगों की अनास्था हो जायेगी । यदि कहिये कि अज्ञानावृत प्राणी में बीजता प्रयुक्त विशेषता हो सकती है, तो ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि सर्वथा बीजताशून्य वस्तु अज्ञान- आवरणमात्र से बीज नहीं हो सकती, अन्यथा पत्थर के टुकड़े जो बीज नहीं है, केवल अज्ञान के आवरण से अंकुरादि के प्रति बीज होने लगेंगे