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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 10–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

स एवाशु भवत्येतन्मृत्पिण्डो घटकोपमः । आदिसर्गे पुरा कायः प्रतिभासोऽस्य चोत्तमः ॥ १० ॥ यस्मादेष विभुर्ब्रह्मा पद्मकोशगृहस्थितः । तत्संकल्पक्रमेणैव ततः स्थितिमुपागता ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यह मन ही देह होता है। उत्तम कर्मो का परिपाक होने पर उत्तम देह होती है, यह बात आदि सर्ग से लेकर दशती हैं। यह मन ही, जैसे मिट्टी का पिण्ड घट के रूप में परिणत हो जाता है वैसे ही, शीघ्र शरीर बन जाता है। पहले पूर्व सृष्टि में इसका प्रतिभासरूप उत्तम शरीर उत्पन्न हुआ, क्योकि पद्मकोशरूपी घर में स्थित विभु ब्रह्मा यह हुआ, तदनन्तर उसके संकल्प के क्रम से ही घन माया से माया की तरह आर- पार-रहित यह सृष्टि स्थिति को प्राप्त हुई हे