Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 26–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 26, 27
संस्कृत श्लोक
सन्निवेशमुपादत्ते तत्तेजः स्वस्वभावतः ।
तस्मिन्स्वसन्निवेशे च तेजःपुञ्जमये पुनः ॥ २६ ॥
भजते भावनां स्फारां निश्चितामातताम्बराम् ।
ऊर्ध्वं शिरःपीठमयीमधःपादमयीं तथा ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें मन की विशेष कल्पनाभिनिवेशरूप शाखा-प्रशाखाओं की वृद्धि होती है, ऐसा कहते है।
तेजपुंजमय अपने अवयवसंनिवेश में ऊपर सिर और पीठवाली नीचे पैरवाली दोनों बगलों में
हाथरूप अवयवों से युक्त और बीच में उदरयुक्त आकाश को व्याप्त करनेवाली निश्चित विशाल
भावना को धारण करता हे