Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
जीवस्य तरलः काय आवर्तः पयसो यथा ।
यथा बीजेऽङ्कुरः स्फारः पल्लवः स्वाङ्कुरे यथा ॥ ७ ॥
पल्लवे च यथा पुष्पं पुष्पकोशे फलं यथा ।
यतः स कल्पनारूपो देहोऽस्ति मनसोऽन्तरे ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल के भीतर आवर्त (भौरी) रहता है, बीज के अन्दर अंकुर रहता है, अंकुर के अन्दर
विशाल वृक्ष रहता है, वृक्ष में जैसे फूल रहता है और फूल के अन्दर जैसे फल रहता है वैसे ही जीव के
अन्दर चंचल (विनाशी) शरीर रहता है।
शंका : जीव के अन्दर शरीर कैसे रहता है ?
समाधान : कारण कि मन के अन्दर कल्पनारूप देह सदा विद्यमान रहती है